अमर नहीं कोई भी

 अमर नहीं कोई भी

 फिर भी रखते हैं गुमान

क्या अमीर क्या गरीब?

एक दिन मर जाएगा, हर इंसान... 

आधुनिक दुनिया की है खासियत

लोगों की मर रही है इंसानियत

हवा हो गई मैली, 

भोजन हुई जहरीली

आयु हुआ है कम मगर, 

लालच बड़ा है भर-भर कर! 

धन चाहिए इतना जरूरत नहीं है जितना, 

भले गरीब को अभाव में तड़पना पड़े कितना... 

चैन से जी ले रे इंसान,

क्यों रहता है इतना परेशान।। 

तू बन जा चाहे कितना अमीर, 

अंत तो है सबका समान!! 

तेरे पूर्वज गए तू भी जाएगा

कोई न अनंत काल तक रह पाएगा

फिर भी तूने पाला है वहम, 

तभी तो तुझे किसी पर न आती रहम!! 

बन जा तू वाकई में इंसान

दिखा दे इंसानियत

कर लोगों की मदद

ताकि तेरे मरने से पहले हो जाए किसी की भलाई, 

मरते मरते कर तू किसी की अच्छाई। 

एक दिन तू मर जाएगा, 

ना कुछ लेकर जाएगा

फिर क्यों तुझे रहता है गुमान

बन जा ऐ इंसान, तू इंसान... 


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Special thanks to

poetess

SHAGUFTA NAAZ





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